बांग्लादेश की राजनीति में जो भूचाल पिछले कुछ महीनों में आया है, उसने दक्षिण एशिया के पूरे कूटनीतिक समीकरण को हिला कर रख दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना लगातार मुखर हैं। उनका नया बयान एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या वाकई जुलाई क्रांति सिर्फ एक सहज छात्र आंदोलन था? या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक साजिश रची गई थी? मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के आने के बाद से जिस तरह के हालात वहां बने हैं, उसने कई छिपे हुए अध्यायों को बाहर ला दिया है।
हसीना के मुताबिक, इस पूरे घटनाक्रम को एक सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया था। शांतिपूर्ण प्रदर्शन का दावा करने वाले इस आंदोलन की आड़ में क्या कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी? आइए इस पूरे मामले की तह तक जाते हैं और उन पहलुओं को टटोलते हैं जिन्हें मुख्यधारा की बहसों में अक्सर छोड़ दिया जाता है।
क्या था वह मोड़ जिसने सब कुछ बदल दिया
शुरुआत एक कोटे से हुई थी। छात्र सड़कों पर उतरे। मांग बिल्कुल साफ थी। सरकारी नौकरियों में कोटा प्रणाली को युक्तिसंगत बनाया जाए। यह एक जायज मांग थी जिस पर अदालत का रुख भी स्पष्ट था। लेकिन अचानक मामला पूरी तरह से पलट गया। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के बीच कुछ ऐसे चेहरे दिखे जिन्होंने हिंसा की आग भड़का दी।
सरकारी संपत्तियों को निशाना बनाया गया। पुलिस थानों पर हमले हुए। मेट्रो स्टेशनों को फूंका गया। जब देश की राजधानी धू-धू कर जल रही थी, तब सुरक्षा एजेंसियों के हाथ बंधे हुए थे। हसीना का यह कहना कि इसे शांतिपूर्ण कहना सरासर झूठ है, इसी बिना पर खड़ा है। कोई भी जन आंदोलन जब सुनियोजित तोड़फोड़ में बदल जाता है, तब वह अपनी मूल वैधानिकता खो देता है।
अंदरूनी और बाहरी ताकतों का खेल
राजनीति में कुछ भी इत्तेफाक से नहीं होता। बांग्लादेश जैसे संवेदनशील भू-राजनीतिक क्षेत्र में बाहरी ताकतों की दिलचस्पी हमेशा से रही है। हसीना ने कई बार इस बात का इशारा किया है कि सत्ता परिवर्तन का यह मॉडल किसी और प्रयोगशाला में तैयार किया गया था।
- सोशल मीडिया का बेहिसाब इस्तेमाल।
- फर्जी खबरों और वीडियो की बाढ़।
- भीड़ को तय समय पर और तय जगहों पर इकट्ठा करना।
ये सारे लक्षण किसी स्वतःस्फूर्त आंदोलन के नहीं बल्कि एक प्रोफेशनल मैनेजमेंट के लगते हैं। जब आप डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर नजर डालते हैं, तो पाते हैं कि किस तरह से एक नैरेटिव गढ़ा गया। आम जनता को यह यकीन दिला दिया गया कि सरकार को उखाड़ फेंकना ही इकलौता समाधान है।
मोहम्मद यूनुस का उदय और अंतरिम सरकार की हकीकत
नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस जब सत्ता की बागडोर संभालने आए, तो पश्चिमी देशों ने राहत की सांस ली। लगा कि देश एक लोकतांत्रिक रास्ते पर लौट आएगा। लेकिन जमीन पर तस्वीर बिल्कुल उलट है। अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं। कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरे लग गए हैं।
हसीना के अनुसार, यूनुस की यह सरकार असल में पर्दे के पीछे से उन ताकतों द्वारा चलाई जा रही है जो बांग्लादेश को अस्थिर देखना चाहती हैं। यूनुस खुद भले ही वैश्विक स्तर पर एक सम्मानित चेहरा हों, लेकिन उनके शासनकाल में जिस तरह से कट्टरपंथी ताकतों को खुली छूट मिली है, उसने देश के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है।
न्याय या राजनीतिक प्रतिशोध
आज ढाका की सड़कों पर जो खामोशी है, वह किसी बड़े तूफान से पहले की शांति जैसी है। अवामी लीग के नेताओं पर ताबड़तोड़ मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल में शेख हसीना और उनके सहयोगियों पर मानवता के खिलाफ अपराध के मुकदमे चलाने की तैयारी है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह न्याय है? या फिर सत्ता हथियाने वालों द्वारा विरोधियों का सफाया करने का नया हथकंडा? जब आप किसी देश के पूरे राजनीतिक इतिहास को एक झटके में मिटाने की कोशिश करते हैं, तो समाज में जो दरारें पड़ती हैं, उन्हें भरना नामुमकिन हो जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम से क्या सीख मिलती है
बांग्लादेश का यह पूरा संकट सिर्फ एक देश की कहानी नहीं है। यह उन तमाम लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के लिए एक चेतावनी है जहां डिजिटल मोबिलाइजेशन का इस्तेमाल करके चुनी हुई सरकारों को गिराया जा सकता है।
भीड़ तंत्र और लोकतंत्र में फर्क होता है। जब भीड़ कानून अपने हाथ में ले लेती है, तब समाज का पतन तय है। आज बांग्लादेश के युवा रोजगार और स्थिरता की तलाश में फिर से देश छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। वह जुलाई क्रांति जो सुनहरे भविष्य का सपना दिखा रही थी, आज एक गहरी अनिश्चितता में बदल चुकी है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वहां की मौजूदा व्यवस्था टिक पाती है या फिर देश एक और बड़े गृहयुद्ध की तरफ बढ़ता है। सच की यह तलाश अभी लंबी है और इसके कई पन्ने अभी पलटे जाने बाकी हैं।