पश्चिम एशिया में तनाव एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां सिर्फ बयानबाजी नहीं बल्कि घातक हथियारों की सीधी होड़ दिख रही है। ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने हाल ही में दावा किया कि इजरायल ने अपने हमलों में बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल किया है। यह बयान सामान्य सैन्य संघर्ष से कहीं आगे की बात है। मिसाइल तकनीक की समझ रखने वाले जानते हैं कि बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल युद्ध के पैमाने को पूरी तरह बदल देता है। आईआरजीसी का यह आरोप केवल सुरक्षा विश्लेषकों के लिए चेतावनी नहीं है। यह पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए एक बड़ा रेड फ्लैग है।
हम इस रणनीतिक बदलाव को सिर्फ एक खबर की तरह नहीं देख सकते। बैलिस्टिक मिसाइलें अपनी तेज रफ्तार और भारी तबाही मचाने की क्षमता के कारण खतरनाक मानी जाती हैं। जब कोई देश इनका उपयोग शुरू करता है, तो इसका मतलब है कि वह संघर्ष को अंतिम सीमा तक ले जाने के लिए तैयार है।
आईआरजीसी के आरोपों की हकीकत और सैन्य समीकरण
ईरान की विशिष्ट सैन्य शाखा आईआरजीसी ने जब इजरायल पर हमलों के लिए बैलिस्टिक मिसाइलें दागने का आरोप लगाया, तो कई सैन्य विशेषज्ञों के कान खड़े हो गए। आम तौर पर इस क्षेत्र में हवाई हमलों या क्रूज मिसाइलों की खबरें ज्यादा आती हैं। क्रूज मिसाइलें धीमी होती हैं और उन्हें ट्रैक करना आसान होता है। बैलिस्टिक मिसाइलें बिल्कुल अलग हैं। वे अंतरिक्ष की बाहरी सीमा तक जाती हैं और फिर गुरुत्वाकर्षण की ताकत से अत्यधिक गति के साथ अपने लक्ष्य पर गिरती हैं। इन्हें रोकना बेहद मुश्किल होता है।
इस दावे के पीछे का सच क्या है? इजरायल ने हमेशा अपनी रक्षात्मक और आक्रामक क्षमताओं को बेहद गुप्त रखा है। हालांकि, इजरायल के पास जेरिको (Jericho) जैसी अत्याधुनिक बैलिस्टिक मिसाइल प्रणालियां मौजूद हैं। आईआरजीसी का दावा है कि इन मिसाइलों का इस्तेमाल रणनीतिक ठिकानों को तबाह करने के लिए किया गया। अगर यह बात सच है, तो इसका मतलब है कि पारंपरिक हवाई श्रेष्ठता की जगह अब सीधे मिसाइल युद्ध ने ले ली है।
सैन्य संतुलन अब पूरी तरह डगमगा चुका है। ईरान खुद एक बड़ा मिसाइल कार्यक्रम चलाता है। उसने अतीत में इजरायल पर सीधे मिसाइल हमले किए हैं। अब इजरायल की तरफ से बैलिस्टिक मिसाइलों के कथित इस्तेमाल की बात सामने आने से साफ है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे को पूरी तरह पस्त करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का अंतर क्यों मायने रखता है
हथियारों की इस लड़ाई को समझने के लिए मिसाइलों के तकनीकी फर्क को जानना जरूरी है। बहुत से लोग सोचते हैं कि हर मिसाइल एक जैसी होती है। ऐसा सोचना बहुत बड़ी गलती है।
क्रूज मिसाइलें मूल रूप से बिना पायलट वाले छोटे विमानों की तरह होती हैं। ये जमीन के समानांतर और कम ऊंचाई पर उड़ती हैं। इन्हें रडार से छिपाना आसान होता है लेकिन इनकी रफ्तार सीमित होती है। वायु रक्षा प्रणालियां इन्हें मार गिरा सकती हैं। इसके विपरीत बैलिस्टिक मिसाइलें रॉकेट की तरह काम करती हैं। उनका रास्ता एक अर्धवृत्त (arc) जैसा होता है। एक बार लॉन्च होने के बाद उन्हें रोकने का समय बहुत कम मिलता है।
जब युद्ध में बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल होती हैं, तो चेतावनी का समय मिनटों में सिमट जाता है। तेल अवीव से तेहरान की दूरी बहुत ज्यादा नहीं है। एक आधुनिक मिसाइल इस दूरी को महज कुछ मिनटों में तय कर सकती है। यही कारण है कि आईआरजीसी के इस बयान ने पूरी दुनिया के नीति निर्माताओं को चिंता में डाल दिया है। यह केवल दो देशों की लड़ाई नहीं है। यह एक ऐसी आग है जो पूरे वैश्विक तेल बाजार और व्यापारिक मार्गों को अपनी चपेट में ले सकती है।
क्षेत्र में सक्रिय प्रॉक्सी नेटवर्क पर इसका असर
इस मिसाइल संकट का सीधा असर केवल ईरान और इजरायल पर नहीं पड़ रहा है। ईरान समर्थित समूहों का एक पूरा नेटवर्क है जो इस संघर्ष में सीधे तौर पर शामिल है। लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूती और सीरिया व इराक में सक्रिय मिलिशिया इस नए समीकरण से अछूते नहीं रह सकते।
- हिजबुल्लाह की सीमाएं: लेबनान की सीमा पर हिजबुल्लाह के पास रॉकेटों का बड़ा जखीरा है। लेकिन बैलिस्टिक मिसाइलों के इस खेल में उनकी क्षमताएं सीमित नजर आने लगती हैं।
- हूती विद्रोहियों का रुख: यमन के हूती लगातार लाल सागर में जहाजों को निशाना बना रहे हैं। इजरायल के इस आक्रामक रुख के बाद ईरान अपने इन सहयोगियों को और अधिक उन्नत हथियार देने की कोशिश कर सकता है।
- सीरियाई मोर्चे पर दबाव: सीरिया में ईरानी ठिकानों पर होने वाले हमलों की तीव्रता बढ़ सकती है, जिससे वहां तैनात रूसी सेना के लिए भी स्थिति जटिल हो जाएगी।
यह नेटवर्क ईरान के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता रहा है। लेकिन अगर इजरायल सीधे बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला कर रहा है, तो यह कवच कमजोर साबित हो सकता है। ईरान को अब अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना होगा। वह केवल अपने प्रॉक्सी के भरोसे बैठकर इजरायल को रोकने की उम्मीद नहीं कर सकता।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और कूटनीतिक विफलता
वैश्विक समुदाय इस स्थिति को मूकदर्शक बनकर देख रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव बेअसर साबित हुए हैं। अमेरिका लगातार इजरायल की रक्षात्मक प्रणालियों को मजबूत करने में जुटा है, जबकि रूस और चीन के ईरान के साथ संबंध गहरे हो रहे हैं। यह ध्रुवीकरण कूटनीति की पूरी विफलता को दर्शाता है।
पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने के जितने भी प्रयास पिछले कुछ वर्षों में हुए, वे सब इस मिसाइल होड़ के सामने ध्वस्त हो चुके हैं। कोई भी देश अब पीछे हटने को तैयार नहीं है। जब मिसाइलें बात करने लगती हैं, तो राजनयिकों की आवाजें दबा दी जाती हैं। इस क्षेत्र में काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं का कहना है कि सैन्य अड्डों को निशाना बनाने के चक्कर में नागरिक बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंच रहा है।
आगे की राह और रणनीतिक जरूरतें
इस खतरनाक मोड़ से बाहर निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं दिखता। स्थिति को और बिगड़ने से रोकने के लिए तुरंत कुछ कड़े कदम उठाने होंगे।
सबसे पहले, दोनों पक्षों के बीच सीधे या परोक्ष संचार माध्यमों को तुरंत बहाल करने की जरूरत है। मिसाइल युद्ध में सबसे बड़ा खतरा गलतफहमी का होता है। एक गलत रडार सिग्नल या गलत आकलन परमाणु क्षमता वाले देशों को महाविनाश की ओर धकेल सकता है।
दूसरे, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को केवल बयानों से आगे बढ़कर दोनों देशों पर हथियारों की आपूर्ति रोकने का दबाव बनाना होगा। जब तक घातक मिसाइल तकनीक और कलपुर्जों की तस्करी बंद नहीं होगी, तब तक यह युद्ध थमेगा नहीं।
तीसरे, क्षेत्रीय देशों जैसे सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को एक मध्यस्थ के रूप में आगे आना होगा। वे इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि इस युद्ध की चिंगारी उनकी अपनी अर्थव्यवस्थाओं को भी बर्बाद कर सकती है। सुरक्षा के नए तंत्र विकसित करने होंगे जहां मिसाइल परीक्षणों और तैनाती की पहले से सूचना देने की व्यवस्था हो। इस तरह के समझौतों के बिना पश्चिम एशिया हमेशा एक टाइम बम पर बैठा रहेगा जो कभी भी फट सकता है।